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  • १५  अगस्त : आज़ादी का जश्न या छुट्टी का दिन ?

    १५ अगस्त : आज़ादी का जश्न या छुट्टी का दिन ?

    हर साल 15 अगस्त आता है। तिरंगा लहराता है, लोग “जय हिंद” कहते हैं, सोशल मीडिया पर देशभक्ति से भरी पोस्टें होती हैं, स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, और हमें मिलती है… एक लंबी छुट्टी!

    लेकिन क्या बस इतनी ही है आज़ादी?

    क्या आज़ादी का मतलब सिर्फ एक दिन की छुट्टी, परेड और मिठाइयाँ हैं?
    या फिर ये उससे कहीं ज्यादा गहरी, बड़ी और जिम्मेदारी भरी चीज़ है?

    आज़ादी हमें किसी ने थाली में परोसकर नहीं दी थी।
    ये वो अधिकार है जिसे अनगिनत लोगों ने अपने खून, पसीने, त्याग और बलिदान से हासिल किया था।

    तो क्या हम इस दिन को सिर्फ एंजॉय करने के लिए मनाते हैं?
    या उन सपनों और कुर्बानियों को याद करने के लिए, जिनकी वजह से हम आज़ाद होकर जी पा रहे हैं?

    शायद सवाल ये नहीं कि 15 अगस्त को हमें क्या करना चाहिए।
    सवाल ये है कि हम 16 अगस्त से 14 अगस्त तक क्या करते हैं।

    आज़ादी का असली जश्न सिर्फ एक दिन नहीं,
    हर दिन हमारे सोचने, बोलने और जीने के तरीके में दिखना चाहिए।

    आज इसको लिखने का विशेष उद्देश्य है, आज के देखते हालात और लोगों का इस दिन के प्रति जो नजरिया है उसे देखते हुए दुःख होता है । इसी के चलते मैं आज आप लोगों के साथ, बचपन में पढ़ी गई कहानी साझा करती हूं । ये कहानी मुझे पता नहीं क्यों हमेशा याद रहती है कारण शायद ये था की ये चैप्टर बहुत लंबा था और मेरा खुद इसको पढ़ने में मन न लग रहा था, शायद कारण मेरा इतिहास में रुचि न रखना था । लेकिन इस कहानी का अंत ऐसा था जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया और मुझे आज तक उस किताब की शायद ये अकेली कहानी ही है जो याद है |

    कहानी कुछ इस प्रकार थी —कहानी थी दूसरे विश्व युद्ध के समय की जब नाज़ी ने फ्रांस को अपने कब्जे में लिया था । एक ऐसे बच्चे की, जिसे फ्रेंच भाषा सीखने में बिल्कुल रुचि नहीं थी। उसे फ्रेंच के पाठ उबाऊ लगते थे। स्कूल जाना, व्याकरण पढ़ना और अपनी भाषा के नियम याद करना उसे किसी बोझ से कम नहीं लगता था। उसे लगता था कि इन चीज़ों से आखिर उसकी ज़िंदगी में क्या बदलने वाला है?

    लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया।

    उसका देश जर्मनी के कब्ज़े में चला गया। आदेश आया कि अब स्कूलों में फ्रेंच नहीं पढ़ाई जाएगी, बल्कि जर्मन भाषा पढ़ाई जाएगी। अचानक वही फ्रेंच भाषा, जिसे वह बच्चा कल तक नापसंद करता था, उसके लिए बहुत मूल्यवान हो गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह केवल एक भाषा नहीं थी। उसमें उसकी पहचान थी, उसकी मिट्टी की खुशबू थी, उसके लोगों की आवाज़ थी और सबसे बढ़कर—उसकी स्वतंत्रता का एक हिस्सा था।

    शायद हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।

    आज हम अपने देश में स्वतंत्र होकर सांस लेते हैं। हम अपनी भाषा बोल सकते हैं, अपनी संस्कृति को जी सकते हैं, अपनी पसंद के कपड़े पहन सकते हैं, अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और अपने देश के भविष्य को लेकर अपनी राय रख सकते हैं। लेकिन क्या हम हमेशा इस स्वतंत्रता की कीमत को महसूस करते हैं?

    शायद नहीं।

    क्योंकि जो चीज़ हमें आसानी से उपलब्ध होती है, उसकी कीमत अक्सर हमें तब समझ आती है जब उसके छिन जाने का डर सामने खड़ा हो।

    भारत की स्वतंत्रता हमें उपहार में नहीं मिली थी।

    “आज़ादी कोई उपहार नहीं थी, जो हमें थाली में परोसकर दे दी गई हो।यह वह अधिकार था जिसे हमारे वीरों ने अपने साहस, संघर्ष और बलिदान से हासिल किया था।”

    यह उन लोगों के साहस, संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम थी, जिन्होंने यह स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि कोई दूसरा हमारे ही देश में हम पर शासन करे। कितने ही लोगों ने अपना घर छोड़ा, कितनों ने जेलें देखीं, कितनों ने यातनाएँ सहीं और कितनों ने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए—सिर्फ इसलिए कि आने वाली पीढ़ियाँ अपने देश में आज़ाद होकर जी सकें।

    आज हमारी जिम्मेदारी केवल इतना नहीं है कि स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहरा दें, राष्ट्रगान गा लें और कुछ देशभक्ति के संदेश साझा कर दें।

    हमारी असली जिम्मेदारी है—इस देश के प्रति वफादार रहना।

    राजनीतिक दल आएंगे और जाएंगे। सरकारें बदलेंगी। नेता बदलेंगे। विचारधाराएँ बदलेंगी। हमारी राजनीतिक पसंद अलग-अलग हो सकती है और हमारे विचारों में मतभेद भी हो सकते हैं। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है।

    लेकिन इन मतभेदों के बीच हमें एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए—

    हमारी पहली पहचान किसी राजनीतिक दल के समर्थक की नहीं, बल्कि इस देश के नागरिक की है।

    हम किसी पार्टी से असहमत हो सकते हैं, लेकिन अपने देश से नहीं। हम किसी नेता की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन अपने देश और अपने देशवासियों के प्रति सम्मान नहीं खोना चाहिए।

    क्योंकि अंत में पार्टी नहीं बचेगी, सरकार नहीं बचेगी, पद नहीं बचेगा—बचेगा तो सिर्फ देश और उसके लोग।

    हमारी भाषा अलग हो सकती है। हमारी संस्कृति अलग हो सकती है। हमारे विचार अलग हो सकते हैं। हमारी पसंद और प्राथमिकताएँ अलग हो सकती हैं। लेकिन इन सबके ऊपर एक चीज़ हमें जोड़ती है—हम भारत के लोग हैं।

    इस स्वतंत्रता दिवस पर शायद हमें केवल यह याद करने की जरूरत नहीं कि हमें आज़ादी कैसे मिली थी, बल्कि यह भी याद करने की जरूरत है कि हमें इस आज़ादी को कैसे संभालकर रखना है।

    आज कल एक नया ट्रेंड है, की चार लोग इकट्ठे होकर देश के प्रति कार्य कर रहे लोगों की आलोचना करेंगे , लेकिन हमें कभी कभी ये सोचना चाहिए कि कभी कभी जिस उम्र पर बैठकर हम हमारे वीर शहीदों की आलोचना कर रहे होते हैं, न जाने कितने ही उस उम्र के पायदान तक कभी न जा पाए हमारी सुरक्षा के कारण ।

    आइए, अपने मतभेद रखें, अपने विचार रखें, सवाल पूछें, असहमति रखें—लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अपने देश के प्रति निष्ठा बनाए रखें।

    क्योंकि जिस आज़ादी के लिए किसी ने अपना आज कुर्बान किया था, उसे हमारी छोटी-छोटी राजनीतिक और सामाजिक दूरियों के कारण कमजोर नहीं होना चाहिए।

    देश किसी पार्टी से बड़ा है।
    देश किसी नेता से बड़ा है।
    देश हमारे व्यक्तिगत मतभेदों से बड़ा है।

    और शायद यही स्वतंत्रता दिवस हमें सबसे बड़ी बात सिखाता है—

    स्वतंत्रता की कीमत उसे खोने के बाद नहीं, उसे जीते हुए समझनी चाहिए।

    आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर एक संकल्प लें—

    मत अलग हो सकते हैं, दिल नहीं।
    विचार अलग हो सकते हैं, देश नहीं।
    पार्टी अलग हो सकती है, भारत नहीं।

    देश पहले। हमेशा।

    जय हिंद! 🇮🇳

    #independenceday #15thaugust2026 #countrycomesfirst

  • The Guava Season

    The Guava Season

    Every year, the moment guavas start appearing in the market, my heart does this little skip. It pulls me right back in time when my father would buy them home, always from the first slot.

    It’s been years since he left us .

    But he never really left.

    He’s with us in every story, every memory.

    Especially in Guava Season.

    Well, the guava thing – No one asks him to bring them,

    No one reminds him. 

    He doesn’t like them. But –

    He just remembers to buy them from the first slot itself. 

    U know why –

    Because I like them too much.

    I never knew when he noticed it.

    As a kid, I thought it was just fruit. 

    Now I know it wasn’t a fruit only.

    It was his way of showing love and care.

    ……………………. (Sigh)

    I know,

    I was not a good daughter. 

    Not the way my sisters were. 

    I didn’t have that loud, clingy, always-hugging kind of bond with my father. 

    For the longest time, I thought it was because I was different. 

    Colder. Distant. Maybe even ungrateful. 

    But recently I realized something. 

    I’m not different. 

    I’m exactly like him.

    Because Just as like my father –

    I trust people easily. 

    I don’t over-argue. I don’t overthink before taking action. 

    I take responsibility for what I do. 

    I help people to the best of my abilities. 

    I try to fulfill everyone’s wishes, even small ones. 

    Money is just money to me. It’s never been the center of my world. 

    But I also get hurt easily,

    Because every small detail matters to me, which most people didn’t even notice.

    As I don’t forget how you behaved to me.

    And just because I talk politely doesn’t mean I’ve forgotten what you did to me. 

    I notice how you treated me when I was of your use and when I was not

    I watch your tone while talking to you.

    I never see you differently because of your social status.

    I never talk badly about anyone.

    I know the truth, but I still enjoy people’s performances.

    I’m not bad at heart. 

    And I’m not at tongue either… until you provoke me. 

    And once you do, I’m not responsible for my actions. 

    In short — I’m a silent giver. Just like my father. 

    And maybe that’s why I failed as a daughter. 

    Because being like him also meant I never learned how to say it out loud. 

    We show love by doing, not by speaking. 

    Now when guava season comes, I buy them myself. 

    I pick the first ones from thela. 

    And while paying, I finally understand. 

    It was never about the guava. 

    It was about showing up. Quietly. Consistently. Without needing credit. 

    I may have failed to say it, but I hope he knows – I turned out just like him. I am Very Proud of it.

    If you have someone like that in your life… 

    If you are someone like that… 

    You’ll get it.

    #fatherdaughterbond #silentlove #theguavaseason